*द्वापर जैसा कालचक्र:जन्माष्टमी पर रोहिणी व अष्टमी का दुर्लभ योग आज*
रीवा। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मथुरा में हुआ था। वर्ष 2026 की जन्माष्टमी को भगवान श्री कृष्ण के जन्म से 5253 वर्ष बीत चुके हैं। अर्थात इस वर्ष हम श्री कृष्ण का 5253 वां जन्म दिवस मनाएंगे। श्री कृष्ण का जन्म वृष राशि, वृष लग्न, कर्क नवांश तथा रोहणी नक्षत्र में अष्टमी तिथि को हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म के पश्चात अनुमानत: 125 वर्ष 7 माह तक पृथ्वी पर राज्य किया एवं चैत्र शुक्ल प्रतिपदा दिन शुक्रवार को 3102 ईसा पूर्व में अपने शरीर का त्याग किया। मान्यता है कि इसी दिन द्वापर युग का समापन हुआ तथा कलयुग का प्रवेश हुआ था।
इस प्रकार वर्तमान समय में कलयुग का 5122 वां वर्ष चल रहा है।
इस आधार पर की गई कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के अनुसार भगवान श्री कृष्ण की जन्म तिथि 21 जुलाई 3228 ईसा पूर्व, पूर्ण तर्क संगत है।
उल्लेखनीय है कि श्रीमद् भागवत एवं भविष्य पुराण की मान्यताओं के अनुसार श्री कष्ण जन्माष्टमी पर्व के समय 6 तत्वों, भाद्रपद माह कृष्ण पक्ष, अर्ध रात्रि काल अष्टमी तिथि- रोहिणी नक्षत्र- वृष राशि का चंद्रमा- तथा बुधवार या सोमवार का संयोग माना गया है , जिनका एक साथ मिलना बहुत दुर्लभ होता है।
प्रायः श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर अष्टमी की अर्धरात्रि वृषभ राशि का चंद्रमा प्राप्त हो जाता है पर रोहिणी नक्षत्र प्राप्त नहीं होता।
यही कारण है कि मध्य रात्रि में अष्टमी तिथि के संचरण और उदय कालीन अष्टमी तिथि को ग्रहण करते हुए वैष्णव एवं स्मार्त संप्रदाय के लोग अलग-अलग 2 दिन जन्माष्टमी मनाते हैं। निर्णय सिंधु की मान्यताओं के अनुसार जन्माष्टमी पर अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र के साथ अष्टमी तिथि मिल जाए तो श्री कृष्ण का पूजा अर्चन करने से 3 जन्मों के दोष दूर हो जाते हैं। उल्लेखनीय है कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी रोहिणी नक्षत्र के योग से रहित हो तो उसे केवला, और यदि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो ऐसी जन्माष्टमी जयंती कहलाती है।जिस मनुष्य को जयंती उपवास का सौभाग्य मिलता है उसके कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा वह मुक्त होकर भगवान श्री कृष्ण के लोक को प्राप्त होता है।
*अदभुत हैं इस वर्ष जन्माष्टमी के संयोग*
इस वर्ष 4 सितंबर 2026 को भगवान श्री कृष्ण के जन्म के पर्याप्त तत्वों का दुर्लभ योग मिल रहा है अर्थात 4 सितंबर को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन अर्धरात्रि व्यापिनी अष्टमी तिथि, दिन शुक्रवार , रोहिणी नक्षत्र एवं वृषभ राशि का चंद्रमा नामक दुर्लभ और परम पुण्य दायक योग बन रहा है। निर्णय सिंधु के अनुसार अर्धरात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र के साथ यदि अष्टमी तिथि मिल जाए तो इसमें भगवान श्री कृष्ण का पूजा अर्चन करने से तीन जनमो के पाप दूर हो जाते हैं। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार भाद्र कृष्ण अष्टमी यदि रोहिणी से युक्त होती है तो वह जयंती नाम से जानी जाती है। 4 सितंबर को अष्टमी तिथि मध्य रात्रि 12:13 तक संचरण करेगी। भगवान श्री कृष्ण का जन्म नक्षत्र रोहिणी इसी दिन रात्रि 11:06 तक संचरण करेगा। भगवान श्री कृष्ण की जन्म राशि का चंद्रमा वृषभ दिन रात संचरण करेगी।
इस प्रकार से 4 सितंबर को भगवान श्री कृष्ण के जन्म के 6 तत्वों में से-भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष
मध्य रात्रि व्यापिनी अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र एवं
वृषभ राशि के चंद्रमा
का दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस वर्ष की जन्माष्टमी जयंती नामक जन्माष्टमी है, इस दिन भगवान श्री कृष्ण के निमित्त पूजन एवं उपवास करने से ऐसी मान्यताएं हैं कि मनुष्य जन्म मरण के चक्र से मुक्त होकर बैकुंठ धाम में निवास करता है।
*जन्माष्टमी के मुहूर्त*
ज्योतिर्वित राजेश साहनी के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, सितम्बर 4, 2026 को निशिता पूजा का समय –
11:41 रात्रि से 12:27 मध्य रात्रि, सितम्बर 05
अवधि – 00 घण्टे 46 मिनट
जन्माष्टमी व्रत के पारण का सर्वाधिक शास्त्र समम्त् तरीका यह है कि अष्टमी एवं रोहिणी नक्षत्र व्याप्त रहने तक जन्माष्टमी का व्रत रहना चाहिए।
👉धर्म शास्त्र के अनुसार पारण समय
पारण समय – 05:47 प्रातः, सितम्बर 05 के बाद
👉वर्तमान में समाज में प्रचलित पारण समय
पारण समय – 12:27 मध्य रात्रि, सितम्बर 05 के बाद।
*ऐसे मनाएं जन्माष्टमी*
👉जन्माष्टमी पर्व पर प्रत्येक सनातन धर्मी को प्रातकाल व्रत का संकल्प कर लेना चाहिए। पूरे दिन उपवास रखते हुए सायंकाल से श्री कृष्ण उत्सव की तैयारियां करनी चाहिए।
👉जन्माष्टमी पर्व पर घर के मुख्य द्वार पर चंदनवार आदि लगाते हुए पुष्प आदि से पूजा ग्रह को सुसज्जित करना चाहिए।
👉भगवान श्री कृष्ण के स्नान के लिए पंचामृत, नैवेद्य के लिए मक्खन मिश्री, पंजीरी, तुलसीदल, कदली फल तथा ऋतु फल आदि पहले से ही तैयार करके रखें।
👉श्री कृष्ण के भजन, उनके चरित्रों का पाठ, गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम आदि के पठन एवं श्रवण में संपूर्ण दिन व्यतीत करना चाहिए।
👉भगवान श्री कृष्ण का जन्म मध्य रात्रि को हुआ था अतः मध्य रात्रि 12:00 बजे से पूर्व स्नान इत्यादि करके श्री कृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन करना चाहिए।
👉मध्य रात्रि ठीक 12:00 बजे बाल गोपाल प्रतिमा को खीरे से निकालकर, उनके जन्म के प्रतीक के रूप में शंख ध्वनि एवं अन्य वाद्य यंत्रों से स्वागत करना चाहिए।
👉तदोपरांत प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराना चाहिए तथा यथासंभव पंचोपचार अथवा षोडशोपचार पूजन करना चाहिए।
👉विभिन्न उपचारों के अंतर्गत श्री कृष्ण की बाल प्रतिमा को वस्त्र, यज्ञोपवित, चंदन, इत्र, पुष्प माला, धूप, मक्खन मिश्री एवं पंजीरी का नैवेद्य, ऋतु फल, पान का बीड़ा तथा दक्षिणा समर्पित करना चाहिए।
👉 इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की कपूर या शुद्ध घी से आरती की जानी चाहिए।
👉तदोपरांत प्रदक्षिणा करते हुए यथासंभव गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करते हुए श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाना चाहिए।
द्वापर जैसा कालचक्र:जन्माष्टमी पर रोहिणी व अष्टमी का दुर्लभ योग आज*
By Janhit TV
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