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आज का पंचांग 1 सितंबर 2026

By Janhit TV

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*आज का पञ्चाङ्ग*
*दिनांक – 01 सितंबर 2026*
*दिन – मंगलवार*
*संवत्सर – रौद्र*
*विक्रम संवत 2083*
*शक संवत -1948*
*कलि युगाब्द – 5128*
*अयन – दक्षिणायन*
*ऋतु – वर्षा ॠतु*
*मास – भाद्रपद*
*पक्ष – कृष्ण*
*तिथि – चतुर्थी सुबह 07:41 तक तत्पश्चात पंचमी*
*नक्षत्र – अश्विनी 02 सितम्बर रात्रि 02:42 तक तत्पश्चात भरणी*
*योग – वृद्धि रात्रि 11:39 तक तत्पश्चात ध्रुव*
*राहुकाल – शाम 03:00 से शाम 04:30 तक*
*सूर्योदय – 05:44*
*सूर्यास्त – 06:16*
स्थानीय समयानुसार राहुकाल सूर्यास्त सूर्योदय समय में अंतर सम्भव है।
*दिशाशूल – उत्तर दिशा मे*
*अग्निवास*
19+03+01=23÷4=03 प्रथ्वी लोक में।
*शिववास*
19+19+5=43÷7 =01 कैलाश वासे।
व्रत पर्व विवरण- मंगलवारी चतुर्थी,(सूर्योदय से सुबह 07:41 तक),पंचक (समाप्त : प्रातः 03:23)
विशेष- चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
चतुर्मास के दिनों में ताँबे व काँसे के पात्रों का उपयोग न करके अन्य धातुओं के पात्रों का उपयोग करना चाहिए।(स्कन्द पुराण)
चतुर्मास में पलाश के पत्तों की पत्तल पर भोजन करना पापनाशक है।
*जन्माष्टमी*
*04 सितम्बर 2026 शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है।*
भारतवर्ष में रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है | – ब्रह्मवैवर्त पुराण

*गर्भवती देवी के लिये–जन्माष्टमी व्रत*
जो गर्भवती देवी जन्माष्टमी का व्रत करती हैं….. उसका गर्भ ठीक से पेट में रह सकता है और ठीक समय जन्म होता है….. ऐसा भविष्यपुराण में लिखा है |
*20 करोड एकादशी का फल देनेवाला व्रत*
जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है । उसमें भी जन्माष्टमी की पूरी रात, जागरण करके जप-ध्यान का विशेष महत्व है ।
भविष्य पुराण में लिखा है कि जन्माष्टमी का व्रत अकाल मृत्यु नहीं होने देता है । जो जन्माष्टमी का व्रत करते हैं, उनके घर में गर्भपात नहीं होता ।
एकादशी का व्रत हजारों – लाखों पाप नष्ट करनेवाला अदभुत ईश्वरीय वरदान है
एकादशी के दिन जो संयम होता है उससे ज्यादा संयम जन्माष्टमी को होना चाहिए ।
बाजारु वस्तु तो वैसे भी साधक के लिए विष है लेकिन जन्माष्टमी के दिन तो चटोरापन, चाय, नाश्ता या इधर – उधर का कचरा अपने मुख में न डालें ।
इस दिन तो उपवास का आत्मिक अमृत पान करें ।अन्न, जल, तो रोज खाते – पीते रहते हैं, अब परमात्मा का रस ही पियें । अपने अहं को खाकर समाप्त कर दें।
*पंo वेदान्त अवस्थी*

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