*दिनांक – 15 सितंबर 2026*
*दिन – मंगलवार*
*संवत्सर – रौद्र*
*विक्रम संवत 2083 (गुजरात अनुसार 2082)*
*शक संवत -1948*
*कलि युगाब्द – 5128*
*अयन – दक्षिणायन*
*ऋतु – शरद ॠतु*
*मास – भाद्रपद*
*पक्ष – शुक्ल*
*तिथि – चतुर्थी सुबह 07:44 तक तत्पश्चात पंचमी*
*नक्षत्र – स्वाती शाम 03:21 तक तत्पश्चात विशाखा*
*योग – इन्द्र दोपहर 12:20 तक तत्पश्चात वैधृति*
*राहुकाल – शाम 03:00 से शाम 04:30 तक*
*सूर्योदय – 05:54*
*सूर्यास्त – 06:06*
स्थानीय समयानुसार राहुकाल सूर्यास्त सूर्योदय समय में अंतर सम्भव है।
*दिशाशूल – उत्तर दिशा मे*
*अग्निवास*
04+03+01=08÷4=00 प्रथ्वी लोक में।
*शिववास*
04+04+5=13÷7 =06 क्रीड़ा याम वासे।
*व्रत पर्व विवरण – मंगलवारी चतुर्थी (सूर्योदय से सुबह 07:44 तक),ऋषि पंचमी*
विशेष- चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
चतुर्मास के दिनों में ताँबे व काँसे के पात्रों का उपयोग न करके अन्य धातुओं के पात्रों का उपयोग करना चाहिए।(स्कन्द पुराण)
चतुर्मास में पलाश के पत्तों की पत्तल पर भोजन करना पापनाशक है।
*ऋषि पंचमी*
*15 सितम्बर 2026 मंगलवार को ऋषि पंचमी है।*
भारत ऋषि मुनियों का देश है। इस देश में ऋषियों की जीवन-प्रणाली का और ऋषियों के ज्ञान का अभी भी इतना प्रभाव है कि उनके ज्ञान के अऩुसार जीवन जीने वाले लोग शुद्ध, सात्त्विक, पवित्र व्यवहार में भी सफल हो जाते हैं और परमार्थ में भी पूर्ण हो जाते हैं।ऋषि तो ऐसे कई हो गये, जिन्होंने अपना जीवन केवल ʹबहुजन हिताय-बहुजनसुखायʹ बिता दिया। हम उन ऋषियों का आदर करते हैं, पूजन करते हैं। उनमें से भी वशिष्ठ, विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, अत्रि, गौतम और कश्यप आदि ऋषियों को तो सप्तर्षि के रूप में नक्षत्रों के प्रकाशपुंज में निहारते हैं ताकि उऩकी चिरस्थायी स्मृति बनी रहे।
👏🏻 ऋषियों को ʹमंत्रदृष्टाʹ भी कहते हैं। ऋषि अपने को कर्ता नहीं मानते हैं। जैसे वे अपने साक्षी-दृष्टा पद में स्थित होकर संसार को देखते हैं, वैसे ही मंत्र और मंत्र के अर्थ को साक्षी भाव से देखते हैं। इसलिए उन्हें ʹमंत्रदृष्टाʹ कहा जाता है।
👏🏻 ऋषि पंचमी के दिन इन मंत्रदृष्टा ऋषियों का पूजन किया जाता है। इस दिन माताएँ विशेष रूप से व्रत रखती हैं।
👏🏻 ऋषि की दृष्टि में न तो कोई स्त्री है न पुरुष। सब अपना स्वरूप है। जिसने भी अपने-आपको नहीं जाना है, उन सबके लिए आज का पर्व है। जिस अज्ञान के कारण यह जीव कितनी ही माताओं के गर्भ में लटकता आया है, कितनी ही यातनाएँ सहता आया है उस अज्ञान को निवृत्त करने के लिए उऩ ऋषि-मुनियों को हम हृदयपूर्वक प्रणाम करते हैं उनका पूजन करते हैं।
उन ऋषि मुनियों का वास्तविक पूजन है-उनकी आज्ञा शिरोधार्य करना। वे तो चाहते हैं-
*देवो भूत्वा देवं यजेत्।*
देवता होकर देवता की पूजा करो। ऋषि असंग, दृष्टा, साक्षी स्वभाव में स्थित होते हैं। वे जगत के सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, शुभ-अशुभ में अपने दृष्टाभाव से विचलित नहीं होते। ऐसे दृष्टाभाव में स्थित होने का प्रयत्न करना और अभ्यास करते-करते अपने दृष्टाभाव में स्थित हो जाना ही उनका पूजन करना है। उन्होंने खून पसीना एक करके जगत को आसक्ति से छुड़ाने की कोशिश की है। हमारे सामाजिक व्यवहार में, त्यौहारों में, रीत-रिवाजों में कुछ-न-कुछ ऐसे संस्कार डाल दिये कि अनंत काल से चली आ रही मान्यताओं के परदे हटें और सृष्टि को ज्यों-का-त्यों देखते हुए सृष्टिकर्ता परमात्मा को पाया जा सके। उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ऋषियों का पूजन करना चाहिए, ऋषिऋण से मुक्त होने का प्रयत्न करना चाहिए।
22 सितम्बर 2026 बुढ़वा मंगल।
25 सितम्बर 2026 दिन शुक्रवार अन्नत चतुर्दशी।
*पंचक*
23 सितम्बर 2026 दिन बुधवार रात्रि 09:57 बजे से 28 सितम्बर 2026 दिन सोमवार सुबह 10:16 बजे तक।
*एकादशी*
22 सितम्बर 2026 दिन मंगलवार पद्मा (कर्मा) एकादशी।
*प्रदोष व्रत*
24 सितम्बर 2026 दिन गुरुवार प्रदोष व्रत।
*पूर्णिमा*
26 सितम्बर 2026 दिन शनिवार स्नान दान वृत पूर्णिमा।
श्राद्ध प्रारम्भ।
*पंo वेदान्त अवस्थी*




