आज का पञ्चाङ्ग~
*दिनांक – 02 अगस्त 2026*
*दिन – रविवार*
*संवत्सर – रौद्र*
*विक्रम संवत् – 2083*
*शक संवत – 1948*
*कलि युगाब्द – 5128*
*अयन – दक्षिणायण*
*ऋतु – वर्षा*
*मास – श्रावण*
*पक्ष – कृष्ण*
*तिथि – चतुर्थी रात्रि 11:15 तक तत्पश्चात् पंचमी*
*नक्षत्र – पूर्व भाद्रपद रात्रि 09:37 तक तत्पश्चात् उत्तर भाद्रपद*
*योग – अतिगण्ड रात्रि 10:30 तक तत्पश्चात् सुकर्मा*
*राहुकाल – शाम 04:30 से शाम 06:00 बजे तक*
*सूर्योदय – 05:15*
*सूर्यास्त – 06:45*
*दिशा शूल – पश्चिम दिशा में*
*अग्निवास*
19+01+01=21÷4=01 स्वर्ग लोक में।
*शिववास*
19+19+5=43÷7 =01 कैलाश वासे।
व्रत पर्व विवरण – सर्वार्थसिद्धि योग (रात्रि 09:37 से प्रातः 05:58 अगस्त 03 तक), गजानन संकष्टी चतुर्थी
विशेष – चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)
*🕉️ सर्वब्रह्म प्रतिपादन 1, सर्ग 263 📜*
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी🙏! सर्वलोक चिन्मात्र✨ है इसी से शान्त और अद्वैतरूप🕊️ है | अज्ञानी को भिन्न भिन्न जगत् भासता है और ज्ञानी🧠 को सब निराकार☁️ और आकाशरूप है | आकार कुछ बने नहीं, आत्मसत्ता निराकार है और वही परमशुद्धसत्ता इस प्रकार भासती है सो शान्तरूप, अनन्त और चिन्मात्र है, इन्द्रियाँ भी ज्ञानरूप हैं और हाड़, माँस, रुधिर, हाथ, पैर, शिर आदिक सम्पूर्ण शरीर💪 भी ज्ञानमात्र है-ज्ञान से भिन्न कुछ नहीं चिन्मात्र ही इस प्रकार हो भासता है |
जैसे स्वप्ने💭 में शरीरादिक और पहाड़⛰️, नदियाँ🌊 और वृक्ष🌳 भासते हैं सो अपना ही अनुभवरूप👁️ है कुछ और नहीं बना तैसे ही यह जगत् सब अनुभवरूप है और कारण⚙️ से रहित कार्य भासता है | तुम अपने अनुभव में जागकर🌅 देखो कि सब अनुभवरूप है |
आकाश में आकाश भी आकाशरूप है, सत्य⚖️ में सत्य है, भाव में भाव है और अभाव में अभाव है सर्व आत्मरूप🌟 है भिन्न कुछ नहीं | जो तुम कहो कि वस्तु कारण ही से उत्पन्न🌱 होती है जो सत्य होती है परन्तु जगत् का कारण कहीं नहीं मिलता इससे यह मिथ्या
है तो कारण भी इसका तब कहिये जब यह कुछ वस्तु हो और कार्य भी तब कहिये जब इसका कारण सत्य हो |
हे रामजी! ब्रह्मसत्ता तो न किसी का समवाय कारण है और न किसी का निमित्त कारण है | वह तो केवल अच्युत है इसी से समवाय कारण नहीं और अद्वैत है इससे निमित्त कारण भी नहीं | वह तो सर्व इच्छा से रहित है उसको किसका कारण कहिये और जो कारण नहीं तो कार्य किसका हो | इससे सर्व जगत् जो भासता है सो आभासमात्र🪞 है-उसी ब्रह्मसत्ता का नाम जगत्🌍 है |
जैसे निद्रा🛌 एक है और उसके दो स्वरूप है-एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति💤 फुरनेरूप का नाम स्वप्ना है और न फुरनेरूप का नाम सुषुप्ति हैं, तैसे ही चैतन्य🔆 के भी दो स्वरूप हैं-फुरने का नाम जगत् है और अफुररूप का नाम ब्रह्म है | जैसे एक ही वायु🌬️ के चलना और ठहरना दो पर्याय हैं-जब चलती है तब लखने में आती है और ठहरती है तब अलक्ष्य हो जाती है और शब्द🗣️ का विषय नहीं होती, तैसे ही ब्रह्मसत्ता अफुर में शब्द की प्रवृत्ति नहीं होती |
जब फुरती है तब दृष्टा, दर्शन और दृश्य त्रिपुटीरूप हो भासती है और एक से अनेक रूप हो भासती है अनेक से एक रूप है | जैसे एक ही जल💧 नदी, नाला, तालाब आदि भिन्न भिन्न संज्ञा पाता है और जब समुद्र🌊 में मिलता है तब एकरूप हो भासता है, एवं जैसे एक ही काल⏳ के दिन, मास, वर्ष, युग, कल्प, घड़ी, मुहूर्त आदिक बहुत नाम होते हैं परन्तु काल तो एक ही है।
एक मृत्तिका की सेना के हाथी🐘, घोड़े🐎 आदिक बहुत नाम होते हैं- परन्तु मृत्तिका तो एक ही है, एक वृक्ष के फूल🌸, फल, टास पत्र भिन्न-भिन्न नाम होते हैं परन्तु वृक्ष तो एक ही रूप है और एक जल के तरंग〰️, बुद्बुदे, आवर्त फेन आदिक नाम होते हैं परन्तु जल तो एक ही है, तैसे ही परमात्मा🕉️ में जगत् अनेक नाम रूप को प्राप्त होता है परन्तु सदा एक ही रूप है |
जैसे स्वप्ने में एक ही अद्वैत अनुभव सत्ता होती है और भिन्न-भिन्न नामरूप हो भासती है पर जब जागता है तब अद्वैतरूप होता है, यह जगत् भी भिन्न-भिन्न नामरूप भासता है परन्तु आत्मसत्ता एक ही है |
हे रामजी! जब तुम उसमे जागोगे तब तुमको सब अपना आप अनुभव ही भासेगा जो केवल आत्मत्वमात्र और अनन्य अनुभवरूप है | आत्मरूपी समुद्र में जगत्रूपी जल के कणके हैं जैसे आकाश में नक्षत्र⭐ फुरते हैं तैसे ही आत्मा में जगत् फुरते हैं | तारे तो आकाश से भिन्न हैं परन्तु जगत् आत्मा से भिन्न नहीं-जैसे जल से बूँद अभिन्न है |
*पंo वेदान्त अवस्थी*


