विकास का मूल्य या विनाश का मूल्य?
क्या हम अपने पूर्वजों की धरोहर के योग्य उत्तराधिकारी हैं?
आत्माराम त्रिपाठी
“वृक्ष कभी अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं। प्रकृति का प्रत्येक उपहार परोपकार का संदेश देता है।”
भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का आधार माना है। हमारे ऋषियों ने वृक्षों में देवत्व देखा, नदियों में मातृत्व और पृथ्वी में जननी का स्वरूप। यही कारण है कि भारत की सभ्यता केवल नगरों की नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन के संतुलन पर आधारित रही है।
हमारे पूर्वजों के पास आधुनिक तकनीक नहीं थी, करोड़ों-अरबों के बजट नहीं थे और न ही विकास की चकाचौंध थी। फिर भी उनकी सोच इतनी व्यापक थी कि वे आने वाली कई पीढ़ियों के हित में निर्णय लेते थे।
उन्होंने यात्रियों के लिए केवल रास्ते नहीं बनाए, बल्कि उन रास्तों को जीवनदायी बनाया। मार्गों के किनारे पीपल, बरगद, नीम, आम और इमली जैसे वृक्ष लगाए, जो राहगीरों को शीतल छाया देते, फल देकर उनकी भूख मिटाते और शुद्ध प्राणवायु प्रदान करते। जहाँ छाया थी, वहाँ जल भी था। कुएँ, बावड़ियाँ, बीहर, तालाब और सरोवर इस प्रकार बनाए गए कि प्यासा कभी निराश न लौटे। धरती की परतों से प्राकृतिक रूप से छनकर आने वाला जल केवल प्यास नहीं बुझाता था, बल्कि स्वास्थ्य और जीवन का भी आधार बनता था।
यह सब किसी सरकारी योजना का परिणाम नहीं था। यह उस समाज की संवेदनशीलता थी, जिसने लोककल्याण को धर्म माना था।
आज हमारे पास विज्ञान है, तकनीक है, मशीनें हैं, धन है और विकास की अनगिनत योजनाएँ हैं; लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमारी नीयत और नीति भी उतनी ही निर्मल है जितनी हमारे पूर्वजों की थी?
दुर्भाग्य से उत्तर संतोषजनक नहीं है।
आज विकास की परिभाषा कंक्रीट, डामर और सीमेंट तक सीमित होती जा रही है। सड़क बनेगी तो सबसे पहले वृक्ष कटेंगे। शहर बढ़ेगा तो तालाब भर दिए जाएँगे। उद्योग आएँगे तो जंगल उजड़ेंगे। बहुमंज़िला इमारतें खड़ी होंगी तो वर्षा का पानी धरती में उतरने के रास्ते बंद कर दिए जाएँगे।
हम यह भूल बैठे हैं कि प्रकृति को हराकर मनुष्य कभी विजेता नहीं बन सकता। वह अंततः अपनी ही पराजय लिखता है।
विश्व आज जलवायु परिवर्तन, भीषण गर्मी, अनियमित वर्षा, सूखते भूजल, प्रदूषित वायु और जल संकट से जूझ रहा है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इसी गति से चलता रहा तो आने वाली पीढ़ियाँ सबसे बड़े पर्यावरणीय संकट का सामना करेंगी। किंतु विडंबना यह है कि जिन उपायों पर आज दुनिया अरबों रुपये खर्च कर रही है, वे उपाय हमारे पूर्वज सदियों पहले अपने जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बना चुके थे।
स्थिति केवल पर्यावरण की नहीं, समाज की भी है।
हम जिस प्रकार के बीज बो रहे हैं, उसी प्रकार की फसल काटेंगे।
एक समय था जब समाज परोपकार के वृक्ष लगाता था। आज हम स्वार्थ, भ्रष्टाचार, अवसरवाद और नैतिक पतन के बीज बो रहे हैं। फिर आश्चर्य किस बात का कि समाज में विश्वास घट रहा है, संवेदनाएँ मर रही हैं और ईमानदारी उपहास का विषय बनती जा रही है?
यदि खेत में बबूल बोया जाएगा तो आम नहीं उगेगा। यदि समाज में चरित्र के स्थान पर छल को सम्मान मिलेगा तो अगली पीढ़ी में आदर्श नागरिक नहीं, अवसरवादी पैदा होंगे।
वृक्षों का कटना केवल पर्यावरण की हानि नहीं है; यह समाज के चरित्र का भी क्षरण है।
इसी प्रकार जलस्रोतों का विनाश भी केवल सुविधा का प्रश्न नहीं है। गाँवों के कुएँ, बावड़ियाँ, तालाब और बीहर आज या तो अतिक्रमण का शिकार हैं या उपेक्षा से समाप्त हो रहे हैं। उनकी जगह पाइपलाइनें और जलशोधन संयंत्र आ गए हैं। आधुनिक व्यवस्था आवश्यक है, किंतु यह भी सत्य है कि प्रकृति के संतुलित जलचक्र का कोई कृत्रिम विकल्प नहीं हो सकता। जितना जल हम धरती से निकाल रहे हैं, उतना उसे वापस लौटा नहीं रहे।
विकास आवश्यक है, किंतु विवेकहीन विकास आत्मघाती होता है।
सड़कें भी बनें, उद्योग भी लगें, शहर भी बसें, लेकिन प्रत्येक परियोजना का पहला प्रश्न यह होना चाहिए कि प्रकृति को न्यूनतम क्षति कैसे पहुँचे? केवल प्रतिपूरक वृक्षारोपण की औपचारिकता नहीं, बल्कि दशकों तक उनकी सुरक्षा और संवर्धन की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित हो। तालाबों और पारंपरिक जलस्रोतों का पुनर्जीवन राष्ट्रीय अभियान बने। प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में कम-से-कम एक ऐसा वृक्ष अवश्य लगाए, जिसकी छाया का लाभ वह स्वयं नहीं, बल्कि अगली पीढ़ियाँ उठाएँ।
भारतीय संस्कृति का एक सुंदर वाक्य है—
“परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः।”
अर्थात् वृक्ष दूसरों के लिए फल देते हैं और नदियाँ दूसरों के लिए बहती हैं।
प्रकृति का समूचा अस्तित्व हमें परोपकार का पाठ पढ़ाता है। प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य उस पाठ को भूलता जा रहा है?
यदि आज भी हमने अपनी सोच नहीं बदली, तो आने वाली पीढ़ियाँ वातानुकूलित कमरों में बैठकर इतिहास की पुस्तकों में पढ़ेंगी कि कभी इस देश की सड़कों पर ऐसे वृक्ष हुआ करते थे जिनकी छाया में पथिक विश्राम करते थे, गाँवों में ऐसे कुएँ होते थे जिनका जल अमृत के समान माना जाता था, और हवा इतनी शुद्ध होती थी कि उसे खरीदना नहीं पड़ता था।
तब इतिहास हमारी उपलब्धियों की नहीं, हमारी भूलों की गिनती करेगा।
अंततः प्रश्न केवल इतना नहीं है कि हमने कितनी सड़कें बनाईं, कितने बाँध बनाए या कितनी ऊँची इमारतें खड़ी कीं। असली प्रश्न यह है कि क्या हमने अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जीने योग्य धरती छोड़ी?
यदि इसका उत्तर “नहीं” है, तो हमारा समूचा विकास अधूरा है।
विकास वही है जो जीवन को समृद्ध करे; जो प्रकृति को उजाड़ दे, वह विकास नहीं, विनाश का सुसज्जित नाम है।



