विशेष संवाददाता रीवा
✍🏻। प्रदेश के जिला अस्पतालों में इलाज कराने पहुंच रहे मरीजों के लिए मुफ्त दवा का वादा कागजी साबित हो रहा है। प्रदेश के 51 जिलों के सिविल सर्जन दवा स्टोर (सीएस ड्रग स्टोर) इस समय दवाओं के संकट से जूझ रहे हैं। आलम यह है कि जो जिले दवाओं की उपलब्धता में टॉप रैंकिंग पर हैं, वहां भी 100 से अधिक प्रकार की दवाएं स्टाक में नहीं हैं। प्रदेश के कई जिलों में तो संकट इतना गहरा है कि करीब 40 प्रतिशत दवाएं उपलब्ध ही नहीं हैं। दवाओं के इस संकट की मुख्य वजह मप्र हेल्थ कॉर्पोरेशन की लचर व्यवस्था है। दरअसल, कॉर्पोरेशन रेट कॉन्ट्रैक्ट के माध्यम से दवाओं की खरीदी कर उन्हें अस्पतालों को सप्लाई करता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि आवश्यक दवाओं की सूची (ईडीएल) में शामिल सभी दवाओं के लिए अब तक रेट कॉन्ट्रैक्ट की प्रक्रिया ही पूरी नहीं की जा सकी है। शासन की इसी सुस्ती के कारण अस्पतालों के रैक खाली हो रहे हैं।
*रीवा अव्वल फिर भी 102 दवाएं कम-:*
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में रीवा सिविल सर्जन दवा स्टोर आवश्यक दवा उपलब्धता के मामले में प्रदेश में पहले नंबर पर है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यहां भी 102 तरह की दवाएं गायब हैं। दूसरे नंबर पर आगर मालवा और तीसरे नंबर पर टीकमगढ़ दवा उपलब्धता में है लेकिन यहां भी 103-103 तरह की दवाओं का स्टाक शून्य है।
भोपाल-इंदौर, जबलपुर व ग्वालियर भी बेहाल
बड़े शहरों के सिविल सर्जन स्टोर भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। जबलपुर में 154, भोपाल में 140, इंदौर में 128 और ग्वालियर में 122 तरह की दवाएं मरीजों को नहीं मिल पा रही हैं। यहां स्टोर से गायब दवाओं में केवल सप्लीमेंट्स ही नहीं, बल्कि अति-आवश्यक जीवन रक्षक दवाएं भी शामिल हैं। बैंडेज और पट्टियां, एंटीबायोटिक, दर्द निवारक और मल्टीविटामिन तक उपलब्ध नहीं हैं।
*भर्ती मरीजों पर भी प्रभाव आवश्यक, दवाओं की कमी-:*
जिला अस्पताल में भर्ती और ओपीडी में इलाज कराने आने वाले मरीजों को प्रभावित करती है। दवाएं उपलब्ध न होने के कारण मरीजों को बाहर से दवाएं लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है।



