*~ आज का पञ्चाङ्ग~*
*दिनांक – 29 अक्टूबर 2025*
*दिन – बुधवार*
*संवत्सर – सिद्धार्थ*
*विक्रम संवत 2082*
*शक संवत -1947*
*कलि युगाब्द – 5127*
*अयन – दक्षिणायन*
*ऋतु – शरद ॠतु*
*मास – कार्तिक*
*पक्ष – शुक्ल*
*तिथि – सप्तमी सुबह 09:23 तक तत्पश्चात अष्टमी*
*नक्षत्र – उत्तराषाढा शाम 05:29 तक तत्पश्चात श्रवण*
*योग – धृति सुबह 07:51 तक तत्पश्चात शूल*
*राहुकाल – दोपहर 12:00 से दोपहर 01:30 तक*
*सूर्योदय – 06:25*
*सूर्यास्त – 05:35*
स्थानीय समयानुसार राहुकाल सूर्यास्त सूर्योदय समय में अंतर सम्भव है।
*दिशाशूल – उत्तर दिशा मे*
*अग्निवास*
07+04+01=12÷4=00 प्रथ्वी लोक में।
*शिववास*
07+07+5=19÷7 =05 भोजन चैव वासे।
व्रत पर्व विवरण – संतजलारामजी जयंती,बुधवारी अष्टमी (सुबह 09:23 से 30 अक्टूबर सूर्योदय तक)
विशेष – सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग बढ़ता है तथा शरीर का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
*31 अक्टूबर 2025 शुक्रवार को आँवला नवमी है।*
भारतीय सनातन पद्धति में पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा आँवला नवमी की पूजा को महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि यह पूजा व्यक्ति के समस्त पापों को दूर कर पुण्य फलदायी होती है। जिसके चलते कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को महिलाएं आँवले के पेड़ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करती हैं।
आँवला नवमी को अक्षय नवमी के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। कहा जाता है कि आंवला भगवान विष्णु का पसंदीदा फल है। आंवले के वृक्ष में समस्त देवी-देवताओं का निवास होता है। इसलिए इसकी पूजा करने का विशेष महत्व होता है।
*व्रत की पूजा का विधान*
नवमी के दिन महिलाएं सुबह से ही स्नान ध्यान कर आँवला के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में मुंह करके बैठती हैं।
इसके बाद वृक्ष की जड़ों को दूध से सींच कर उसके तने पर कच्चे सूत का धागा लपेटा जाता है।
तत्पश्चात रोली, चावल, धूप दीप से वृक्ष की पूजा की जाती है।
महिलाएं आँवले के वृक्ष की १०८ परिक्रमाएं करके ही भोजन करती हैं।
*आँवला नवमी की कथा*
वहीं पुत्र रत्न प्राप्ति के लिए आँवला पूजा के महत्व के विषय में प्रचलित कथा के अनुसार एक युग में किसी वैश्य की पत्नी को पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हो रही थी। अपनी पड़ोसन के कहे अनुसार उसने एक बच्चे की बलि भैरव देव को दे दी। इसका फल उसे उल्टा मिला। महिला कुष्ट की रोगी हो गई।
इसका वह पश्चाताप करने लगे और रोग मुक्त होने के लिए गंगा की शरण में गई। तब गंगा ने उसे कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आँवला के वृक्ष की पूजा कर आँवले के सेवन करने की सलाह दी थी।
जिस पर महिला ने गंगा के बताए अनुसार इस तिथि को आँवला की पूजा कर आँवला ग्रहण किया था, और वह रोगमुक्त हो गई थी। इस व्रत व पूजन के प्रभाव से कुछ दिनों बाद उसे दिव्य शरीर व पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तभी से हिंदुओं में इस व्रत को करने का प्रचलन बढ़ा। तब से लेकर आज तक यह परंपरा चली आ रही है।
*पंचक*
31 अक्टूबर 2025 दिन शुक्रवार सुबह 06:48 बजे से 04 नवम्बर 2025 दिन मंगलवार दोपहर 12:35 बजे तक।
*एकादशी*
01 नवम्बर 2025 दिन शनिवार देव प्रबोधिनी (देव उठनी )एकादशी।
*प्रदोष*
03 नवम्बर 2025 दिन सोमवार प्रदोष व्रत।
*पूर्णिमा*
05 नवम्बर 2025 दिन बुधवार स्नान दान वृत पूर्णिमा।
*पंo वेदान्त अवस्थी*



